छायावाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ | Chhayavad ki Pramukha Pravrittiyan aur Visheshtaen

हिंदी साहित्य में ‘छायावाद’ शब्द का प्रथम लिखित प्रयोग मुकुटधर पाण्डेय ने किया।

सन् 1920 में जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका ‘श्रीशारदा’ में ‘हिंदी में छायावाद’ शीर्षक से चार चरणों में लेख लिखकर छायावाद की आरंभिक विवेचना की ।

मुकुटधर पाण्डेय ने अपने लेखों में छायावाद की पाँच विशेषताओं का उल्लेख किया, जो निम्नानुसार हैं :

1. वैयक्तिकता, 2. स्वातंत्र्य चेतना, 3. रहस्यवादिता, 4. शैलीगत वैशिष्ट्य,  5. अस्पष्टता

सरस्वती पत्रिका, जुलाई 1920 ई. अंक में प्रकाशित मुकुटधर पाण्डेय की कविता ‘कुररी के प्रति’ छायावाद की प्रथम कविता मानी जाती है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मुकुटधर पाण्डेय को ‘छायावाद का प्रवर्तक’ स्वीकार किया है ।

मुकुटधर पाण्डेय ने ‘आँसू’, ‘उद्गार’, ‘प्रेमबंधन’, ‘पूजाफूल’, ‘कानन कुसुम’ आदि रचनाएँ लिखी हैं।

छायावाद (1918 ई. से 1936 ई.) की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ

छायावादी काव्य विषय-वस्तु एवं शैली दोनों ही दृष्टियों से अपने पूर्ववती काव्य से अलग है। इस काव्यधारा की प्रमुख प्रवृत्तियों का निरूपण निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है :

आत्माभिव्यंजना (आत्माभिव्यक्ति की ‘मैं’ शैली)

छायावादी कवियों ने काव्य की विषय-वस्तु अपने व्यक्तिगत जीवन से ही खोजने का प्रयास किया। अपने जीवन के निजी प्रसंगों, घटनाओं एवं व्यक्तिगत भावनाओं को अनेक छायावादी कवियों ने काव्य-वस्तु बनाया।

छायावादी कविता में वैयक्तिक सुख-दुःख की खुलकर अभिव्यक्ति हुई। जयशंकर प्रसाद कृत ‘आंसू’ काव्य और सुमित्रानंदन पंत कृत ‘उच्छवास’ नामक कविता इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

सुमित्रानंदन पंत जी ने अपनी ‘प्रिया’ को मन मन्दिर में बसाकर उसे पूजने का उल्लेख निम्न पंक्तियों में किया है :

विधुर उर के मृदु भावों से तुम्हारा कर नित नव शृंगार।

पूजता हूं मैं तुम्हें कुमारि, मूंद दुहरे दृग द्वार।।

सुमित्रानंदन पंत

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की कई कविताओं में उनके व्यक्तिगत जीवन का सत्य व्यक्त हुआ है। ‘राम की शक्ति पूजा’ में राम की हताशा, निराशा में कवि के अपने जीवन की निराशा की अभिव्यक्ति हुई है। उन्हें जीवन भर लोगों के जिस विरोध को झेलना पड़ा उसकी गूंज निम्न पंक्तियों में है :

“धिक जीवन जो पाता ही आया है विरोध ।

धिक साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध ॥

-सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’-

महादेवी वर्मा की कविताओं में भी आत्माभिव्यंजना की प्रवृत्ति उपलब्ध होती है। वेदना की जो प्रधानता उनकी कविताओं में है, उस पर उनके जीवन की छाया है, ऐसा कहना अनुपयुक्त न होगा।

सौन्दर्य चित्रण

छायावादी कवि मूलतः प्रेम और सौन्दर्य के कवि हैं, किन्तु उनकी सौन्दर्य भावना सूक्ष्म एवं उदात्त है। उसमें रीतिकालीन स्थूलता एवं मांसलता का नितान्त अभाव है। सौन्दर्य चित्रण में उनकी वृत्ति बाह्य वर्णनों में उतनी नहीं रमी, जितनी आन्तरिक सौन्दर्य के उद्घाटन में एवं भाव दशाओं के वर्णन में रमी।

 नेत्रों के सौन्दर्य एवं उसके प्रभाव की व्यंजना निम्न पंक्तियों में जयशंकर प्रसाद जी ने अत्यन्त आकर्षक ढंग से की है :

कमल से जो चारु दो खंजन प्रथम।

पंख फड़काना नहीं थे जानते।।

चपल चोखी चोट कर अब पंख की।

विकल करते भ्रमर को आनन्द से।।

-जयशंकर प्रसाद

शारीरिक अंगों की कान्ति का वर्णन भी उसमें बड़े आकर्षक ढंग से हुआ है। ‘कामायनी’ में जयशंकर प्रसाद जी ने श्रद्धा के सौन्दर्य का वर्णन निम्न प्रकार किया है :

नील परिधान बीच सुकुमार

खुल रहा मृदुल अधखुला अंग।

खिला हो ज्यों बिजली का फूल

मेघ बन बीच गुलाबी रंग ।।

-जयशंकर प्रसाद-

यहाँ कवि ने ‘सुकुमार अंग’ (उरोजों) का वर्णन तो किया है, किन्तु वह सांकेतिक शैली में ही किया गया है।

सौन्दर्य परमात्मा के द्वारा मानव को प्रदत्त सात्विक ‘वरदान’ है। जयशंकर प्रसाद के अनुसार, “उज्ज्वल वरदान चेतना का सौन्दर्य जिसे सब कहते हैं।”

सौन्दर्य की अभिव्यक्ति सांकेतिक शैली में उन्होंने की है। श्रद्धा का सौन्दर्य फूलों के पराग, सुगन्ध एवं मकरन्द (फूल का रस) से युक्त है –

कुसुम कानन अंचल में मन्द पवन प्रेरित सौरभ साकार ।

रचित परमाणु पराग शरीर खड़ा हो ले मधु का आधार।।

जयशंकर प्रसाद

शृंगार-निरूपण

द्विवेदीयुगीन कविता में शृंगार-निरूपण बहुत कम हुआ है और जहाँ हुआ है वहाँ भी मर्यादित रूप में ही है। छायावाद में आकर कविता में पुनः शृंगार की प्रतिष्ठा हुई। इन कवियों ने शृंगार के संयोग एवं वियोग दोनों पक्षों के आकर्षक चित्त अंकित किए।

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने ‘जुही की कली’ नामक कविता में प्रकृति के प्रतीकों से प्रेम व्यापारों का निरूपण किया :

निर्दय उस नायक ने

निपट निठुराई की।

झोंकों की झाड़ियों से,

सुन्दर सुकुमार देह,

सारी झकझोर डाली ॥

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

सुमित्रानंदन पन्त के काव्य में प्रेम और शृंगार भावना की बड़ी सहज अभिव्यक्ति हुई है। प्रिया का आकर्षण मन को पागल कर देता है :

“तुम में जो लावण्य मधुरिमा जो असीम सम्मोहन

तुम पर प्राण निछावर करने पागल हो उठता मन।

नहीं जानती क्या निज बल तुम, निज अपार आकर्षण ?”

-सुमित्रानंदन पन्त-

वियोग श्रृंगार के अति भव्य चित्र जयशंकर प्रसाद कृत ‘आंसू’ में उपलब्ध होते हैं। प्रिया के वियोग से मन की विकलता कितनी तीव्र हो गई है, इसका चित्र निम्न पंक्तियों में देखा जा सकता है :

झंझा झकोर गर्जन था बिजली सी थी नीरद माला।

पाकर इस शून्य हृदय को सबने आ घेरा डाला।।

-जयशंकर प्रसाद-


रो-रोकर सिसक-सिसक कर कहता मैं करुण कहानी

तुम सुमन नोचते सुनते करते जानी अनजानी ।।

–जयशंकर प्रसाद-

कविवर सुमित्रानंद पन्त ने भी वियोग-व्यथा का मार्मिक वर्णन अपनी कविताओं में किया है। वे तो यह मानते हैं कि कविता का जन्म ही वियोग व्यथा से हुआ होगा। उस प्रेमी की आहों ने ही कविता का रूप धारण कर लिया होगा :

“वियोगी होगा पहला कवि,

आह से उपजा होगा गान ।

निकलकर आंखों से चुपचाप,

बही होगी कविता अनजान।।”

-सुमित्रानंद पन्त-

प्रिया का ध्यान हृदय में वेदना की कसक उत्पन्न कर उसे अधीर कर देता है:

“तड़ित सा सुमुखि तुम्हारा ध्यान,

प्रभा के पलक मार उर चीर ।

 गूढ़ गर्जन कर जब गम्भीर,

मुझे करता है अधिक अधीर।

 जुगनुओं से उड़ मेरे प्राण,

खोजते हैं तब तुम्हें निदान।”

-सुमित्रानंद पन्त

महादेवी वर्मा के काव्य में तो विरह एवं वेदना की ही अधिकता है। वे कहती हैं :

विस्तृत नभ का कोई कोना,

मेरा न कभी अपना होना।

परिचय इतना इतिहास यही,

उमड़ी कल थी मिट आज चली ।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि शृंगार निरूपण (संयोग और वियोग दोनों) छायावाद की प्रमुख प्रवृत्ति रही है।

नारी भावना

छायावादी कवियों ने नारी के प्रति उदात्त दृष्टिकोण अपनाकर समाज में उसके सम्माननीय स्थान को प्रतिष्ठित किया। रीतिकालीन कवियों ने नारी को विलास की वस्तु और उपभोग की सामग्री मात्र माना, जबकि छायावादी कवियों ने उसे प्रेरणा का पावन उत्स (झरना या स्त्रोत) मानते हुए गरिमा प्रदान की। वह दया, क्षमा, करुणा, प्रेम की देवी है और अपने इन गुणों के कारण श्रद्धा की पात्र है:

“नारी ! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में।

पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।”

-जयशंकर प्रसाद

(‘कामायनी’ का ‘लज्जा सर्ग’)

सुमित्रानन्दन पन्त ने  ‘देवि, मां, सहचरि, प्राण’ कहकर नारी के प्रति अपने आदर का परिचय दिया।

जयशंकर प्रसाद जी के हृदय में नारी का बहुत ऊंचा स्थान था। निम्न पंक्तियों से उनके विचारों को जाना जा सकता है :

“तुम देवि! आह कितनी उदार,

 वह मातृ मूर्ति है निर्विकार ।

हे सर्वमंगले! तुम महती,

 सबका दुःख अपने पर सहती ।।”

-जयशंकर प्रसाद-

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने भी नारी को निराश पुरुष के हृदय में आशा का संचार करने वाली शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया। ‘राम की शक्ति पूजा’ में राम के निराश हृदय में सीता की स्मृति मात्र से आशा का संचार होते दिखाया गया हैं :

“ऐसे क्षण अन्धकार घन में जैसे विद्युत।

जागी पृथ्वी-तनया-कुमारिका-छवि अच्युत ।।”

-निराला ‘राम की शक्ति पूजा’-

रहस्य भावना (अज्ञात के प्रति जिज्ञासा)

छायावादी काव्य में रहस्यवाद की प्रवृत्ति भी प्रमुख रूप से उपलब्ध होती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसी कारण से ‘छायावाद’ का अर्थ ‘रहस्यवाद’ माना है। प्रायः सभी छायावादी कवियों ने अज्ञात सत्ता के प्रति ‘जिज्ञासा’ के भाव व्यक्त किए हैं।

सुमित्रानंदन पन्त की ‘मौन निमन्त्रण’ कविता में इसकी अभिव्यक्ति बहुत सुन्दर ढंग से हुई है :

“न जाने कौन अए द्युतिमान,

जान मुझको अबोध अज्ञान ।

सुझाते हो तुम पथ अनजान,

फूंक देते छिद्रों में गान।। “

-सुमित्रानंदन पन्त-

जयशंकर प्रसाद जी ने ‘कामायनी’ में स्थान-स्थान पर उस अज्ञात सत्ता के अस्तित्व का बोध कराया है। पता नहीं वह अज्ञात सत्ता कौन है, कैसी है, और क्या है :

“हे अनन्त रमणीय कौन तुम,

यह मैं कैसे कह सकता?

कैसे हो, क्या हो, इसका तो,

भार विचार न सह सकता।।”

-जयशंकर प्रसाद-

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की ‘तुम और मैं’ कविता में उस परमात्मा से अनेक प्रकार के सम्बन्ध जोड़े गए हैं। यदि वह हिमालय है तो मैं उससे निःसृत होने वाली गंगा, यदि वह हृदय के भाव हैं तो मैं उससे जन्म लेने वाली कविता:

तुम तुंग हिमालय शृंग और मैं चंचल गति सुरसरिता।

तुम विमल हृदय उच्छवास और मैं कान्त कामिनी कविता।।

-सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’-

महादेवी वर्मा के काव्य में भी रहस्यवाद की प्रवृत्ति उपलब्ध होती है। वे कहती हैं:

करुणामय को भाता है, तम के पर्दों में आना ।

प्रकृति चित्रण 

छायावादी कवि प्रकृति के कुशल चितेरे हैं। इन कवियों ने प्रकृति पर मानवीय चेतना का आरोप करते हुए उसे हंसते-रोते हुए भी दिखाया है:

“अचिरता देख जगत की आप,

 शून्य भरता समीर निश्वास ।

डालता पातों पर चुपचाप, 

ओस के आंसू नीलाकाशा।।”

-सुमित्रानन्दन पन्त-

यहाँ वायु को ठण्डी सांस भरते हुए, आकाश को रोते दिखाया गया है। सुमित्रानन्दन पन्त जी ने तो प्रकृति को ही अपनी काव्य-प्रेरणा माना है और वे प्रकृति सौन्दर्य को नारी सौन्दर्य पर वरीयता देते हैं।

 ‘मोह’ नामक कविता में सुमित्रानन्दन पन्त स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि नारी सौन्दर्य में आकर्षण होता है, पर वह इतना नहीं कि प्रकृति सौन्दर्य की उपेक्षा करवा सके :

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया

तोड़ प्रकृति से भी माया

बाले! तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूं ‘लोचन’,

भूल अभी से इस जग को!

-सुमित्रानन्दन पन्त-

सुमित्रानन्दन पन्त जी प्रकृति के सुकुमार कवि कहे जाते हैं। प्राकृतिक सुषमा का चित्रण उन्होंने प्रकृति को आलम्बन बनाकर अपनी अनेक कविताओं में किया है। वस्तुतः आलम्बन रूप में प्रकृति निरूपण छायावादी प्रकृति चित्रण की प्रमुख विशेषता मानी जा सकती है। सुमित्रानन्दन पन्त की ‘बादल’ कविता में आलम्बन रूप में प्रकृति चित्रण किया गया है।

 ‘कामायनी’ में जयशंकर प्रसाद जी ने ‘हिमालय’ का निम्न चित्र अंकित किया है:

“संध्या घन माला की सुन्दर,

ओढ़े रंग-बिरंगी छींट।

गगन चुम्बिनी शैल श्रेणियां,

पहने हुए तुषार किरीट ।।”

-जयशंकर प्रसाद-

आलम्बन रूप के अतिरिक्त उद्दीपन रूप में, अलंकार के रूप में, प्रतीकात्मक रूप में तथा मानवीकरण रूप में प्रकृति निरूपण छायावादी काव्य में हुआ है।

 डॉ. रामकुमार वर्मा ने इसी कारण छायावाद को प्रकृतिवाद की संज्ञा देते हुए कहा है— “प्रकृति का क्षेत्र ही इन कवियों की कविता का क्षेत्र है। ऐसी स्थिति में इस कविता को यदि छायावाद के बजाय ‘प्रकृतिवाद’ कहें तो अधिक युक्तिसंगत होगा।”

दुःख और वेदना की अभिव्यक्ति 

छायावादी काव्य में दुःख और वेदना भाव की अभिव्यक्ति हुई है। महादेवी वर्मा तो वेदना की ही कवयित्री हैं। वे अपने वेदना विह्वल हृदय की तुलना ‘मेघखण्ड’ से करती हुई कहती हैं:

“मैं नीर भरी दुःख की बदली

विस्तृत नभ का कोई कोना

मेरा न कभी अपना होना

 परिचय इतना इतिहास यही

उमड़ी कल थी मिट आज चली ॥”

-महादेवी वर्मा-

महादेवी वर्मा के गद्य-पद्य में जो दुःखवाद और करुणा के भाव दिखाई पड़ते हैं, वे बौद्ध दर्शन के प्रभावस्वरूप माने जा सकते हैं।

जयशंकर प्रसाद के ‘आंसू’ काव्य में भी वेदना की ही कहानी है। उन्होंने अपनी पीड़ा को ही काव्य के रूप में व्यक्त किया है :

“जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति सी छाई ।

दुर्दिन में आंसू बनकर वह आज बरसने आई।।”

-जयशंकर प्रसाद-

सुमित्रानन्दन पन्त ने ‘परिवर्तन’ कविता में यह स्वीकार किया है कि संसार में दुःख की अधिकता है, यहाँ शान्ति जीवन पर्यन्त प्राप्त नहीं हो सकती :

“यहाँ सुख सरसों शोक सुमेरु,

 अरे जग है जग का कंकाल ।

 वृथा रे यह अरण्य चीत्कार,

 शान्ति सुख है उस पार ।।”

-सुमित्रानन्दन पन्त-

राष्ट्र प्रेम की अभिव्यक्ति

छायावादी काव्य में राष्ट्रीयता के स्वर भी मुखरित हुए हैं। जयशंकर प्रसाद जी ने अपने नाटकों में जो गीत योजना की है, उसमें राष्ट्रीय भावना की सुन्दर अभिव्यक्ति हुई है। उन्होंने भारत के अतीत गौरव के चित्र अंकित करते हुए देश की महिमा का बखान किया है:

अरुण यह मधुमय देश हमारा।

जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा ।।

-जयशंकर प्रसाद

माखनलाल चतुर्वेदी के गीतों में राष्ट्रभक्ति अपने चरम उत्कर्ष पर है। ‘पुष्प की अभिलाषा’ में उन्होंने एक पुष्प की यह इच्छा व्यक्त की है कि उसे शहीदों के चरणों तले आने का सौभाग्य मिले:

“मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक।

मातृभूमि पर सीस चढ़ाने जिस पथ जाएं वीर अनेक ॥”

-माखनलाल चतुर्वेदी-

 छायावादी कविता की इस राष्ट्रीय चेतना को देखकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कवि अपने युग से नितान्त उदासीन नहीं थे।

मानवतावाद

छायावादी वैयक्तिक मुक्ति की संकल्पना विस्तृत होते-होते मानवमात्र की मुक्ति की संकल्पना में परिवर्तित हो जाती है । छायावाद के ‘मैं’ में ‘हम’ भी समाहित हो जाता है ।

जब निराला के राम ‘अन्याय जिधर, है उधर शक्ति’ कहते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी चिंता महज अपहर्ता के चंगुल से अपनी पत्नी को मुक्त करवाना भर नहीं है, वरन् सत् और असत्, मानव और राक्षस, न्याय और अन्याय के बीच चलने वाले संघर्ष में मानवता, न्याय और सत्य को विजय दिलावना है। यहाँ राम की चिंता व्यक्तिगत कम और समष्टिगत ज्यादा है, जो मानवीयता से प्रेरित है ।

शिल्पगत प्रवृत्तियां

भाषा

भाषा की कोमलता छायावाद की सबसे बड़ी उपलब्धि है । छायावाद की खड़ीबोली कविता के समक्ष ब्रजभाषा खुरदुरी प्रतीत हुई और ब्रजभाषा समर्थकों का यह दावा निरर्थक सिद्ध हुआ कि खड़ी बोली मधुर में भावों की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। कोमलकान्त पदावली, लयात्मकता, संगीतात्मकता छायावादी कविता की महत्वपूर्ण विशेषता है ।

एक उदाहरण देखिए :

स्वर्ण, सुख श्री सौरभ में भोर

विश्व को देती है जब बोर

विहग कुल की कलकंठ हिलोर

मिला देती भू नभ के छोर

-सुमित्रानन्दन पंत-

सुमित्रानन्दन पंत जी को इसीलिए शब्द-शिल्पी उचित ही कहा जाता है ।

अलंकार

नवीन अलंकारों के प्रयोग की दृष्टि से भी छायावादी काव्य अत्यंत महत्वपूर्ण है । छायावाद ने अंग्रेजी साहित्य के दो नवीन अलंकार ‘मानवीकरण (personification)’ और ‘विशेषण विपर्यय (transferred epithet’ हिंदी काव्य-संसार को दिए जो छायावाद के कलापक्ष की एक उल्लेखनीय विशेषता है ।  

मानवीकरण का उदाहरण :

दिवसावसान का समय

मेघमय आसमान से उतर रही है

वह संध्या सुंदरी परी-सी

धीरे-धीरे-धीरे

-सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला-

विशेषण विपर्यय का उदाहरण :

तुम्हारी आँखों का बचपन खेलता जब अलहड़ खेल

-सुमित्रानन्दन पंत-

छंद

छायावादी काव्य में मालिनी, वसंततिलका, हरिगीतिका, रूपमाला, राधिका, सखी एवं अतुकांत छंदों के साथ-साथ ‘मुक्त छंद’ की प्रतिष्ठा पहली बार हुई। निराला मुक्त छंद के प्रथम पुरस्कर्ता कहे जाते हैं, जिनकी ‘जुही की कली’ रचना मुक्त छंद का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इसका उदाहरण देखें :

विजन वैन वल्लरी पर

सोती थी सुहाग भरी

अमल-कोमल तनु तरूणी।

-(जुही की कली -परिमल- निराला)-

प्रतीकात्मकता

प्रतीकात्मकता छायावादी काव्यशैली की एक विशिष्ट प्रवृत्ति थी । छायावादी कवियों ने परंपरागत एवं रूढ़ प्रतीकों को एक नयी अर्थवत्ता प्रदान की । इसके साथ-साथ प्रतीकों के लिए नये-नये स्त्रोतों का चयन किया। छायावादी कवियों के प्रतीक स्वच्छंद किस्म के होने के साथ-साथ अभीष्ट अर्थ व्यक्त करने में समर्थ हैं ।

छायावादी प्रतीकात्मकता का एक उदाहरण इस प्रकार है :

बिखरी अलकें ज्यों तर्क जाल

वह विश्व मुकुट-सा उज्ज्वलतम शशिखंड-सदृश था स्पष्ट भाल

-जयशंकर प्रसाद

बिम्ब-विधान

बिम्ब-विधान छायावाद की विशिष्ट प्रकृति थी। छायावादी कवियों ने प्रायः प्रकृतिक सौन्दर्य का ही बिम्ब-संसार प्रस्तुत किया और इस क्षेत्र में उन्हें अभूतपूर्व सफलता मिली । छायावादी काल में ऐतिहासिक, पौराणिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, अनुसंधान आदि से भी बिम्ब-विधान की सामग्री ली गई।  छायावादी काव्य के एक सर्वथा मौलिक बिम्ब-विधान का उदाहरण देखें – 

नील परिधान बीच सुकुमार, खुल रहा मृदुल अधखुला अंग।

खिला हो ज्यों बिजली का फूल, मेघवन बीच गुलाबी रंग ॥

गीत और प्रगीत

गीत और प्रगीत की दृष्टि से छायावादी काव्य अत्यंत विशिष्ट और महत्वपूर्ण है । ‘नीरजा’ में संगृहीत महादेवी वर्मा के गीत तो अत्यंत अद्भुत हैं। महादेवी वर्मा ही नहीं बल्कि अन्य छायावादी कवियों के गीत बेजोड़ हैं, जिनमें आत्माभिव्यंजना, तीव्रानुभूति, भावोद्रेकता, संक्षिप्तता इत्यादि गीतिकाव्य की समस्त विशेषताएँ मुखरित हुई हैं ।

छायावादी गीत का एक उदाहरण इस प्रकार हैं :

मधुर मधुर मेरे दीपक जल। प्रियतम का पथ आलोकित कर। – महादेवी वर्मा

पाश्चात्य काव्य-परंपरा में ‘शोक-गीति’ का प्रारम्भ करने वाले निराला की ‘सरोज-स्मृति’ कविता न सिर्फ़ छायावादी काव्य की बल्कि हिंदी-साहित्य का सर्वश्रेष्ठ शोकगीत है । इसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं :

मुझ भाग्यहीन की तू संबल

युग वर्ष बाद जब हुई विकल

दुख ही जीवन की कथा रही

क्या कहूँ आज जो नहीं कही

सरोज स्मृति -सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

निष्कर्ष

अतः निष्कर्ष के रूप में हम यह कह सकते हैं कि छायावादी काव्य विषय-वस्तु एवं शिल्प-दोनों ही दृष्टियों से नवीनता लिए हुए है। लाक्षणिक भाषा का प्रयोग, प्रतीकात्मक शैली, उपचारवक्रता एवं नवीन अलंकार विधान के कारण इस काव्य में शिल्पगत नवीनता दिखाई पड़ती है । पन्त की निम्नलिखित पंक्तियों में प्रतीकात्मकता एवं लाक्षणिकता को देखा जा सकता है :

अभी तो मुकुट बंधा था माथ

हुए कल ही हल्दी के हाथ।

खुले भी न थे लाज के बोल

खिले भी चुम्बन शून्य कपोल॥

 हाय रुक गया यहीं संसार

बना सिन्दूर अंगार ।

 वातहत लतिका वह सुकुमार

पड़ी है छिन्नाधार ||

-सुमित्रानन्दन पन्त-

यहाँ सुकुमार लता उस नवयुवती का प्रतीक है जिसका सुहाग उजड़ गया है। सिन्दूर का अंगार बनना उसके वैधव्य को सूचित करता है, अतः भाषा में लाक्षणिकता का समावेश है। छायावादी काव्य में पारंपरिक अलंकारों के साथ-साथ विशेषण विपर्यय, मानवीकरण, ध्वन्यार्थ व्यंजना और विरोधाभास अलंकार भी  प्रचुरता से प्रयुक्त किए गए हैं। अमूर्त उपमान भी इस काव्य की विशेषता है। मुक्तक गीति शैली और चित्रोपम भाषा के साथ-साथ नवीन छन्द विधान भी इस काव्य की अपनी विशेषताएं हैं ।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि छायावाद हिंदी काव्य का गौरवपूर्ण अध्याय है तथा प्रसाद, पन्त, निराला और महादेवी इस युग के ऐसे हस्ताक्षर हैं जिनके योगदान से हिंदी साहित्य को श्री समृद्धि प्राप्त हुई है।

 

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