उत्तर आधुनिकतावाद क्या है | Uttar Adhunikatavad Kya Hai

उत्तर-आधुनिकता (Post-modernism) पदबंध का प्रयोग सर्वप्रथम जॉन बार्थ ने 1967 में कला के संदर्भ में किया ।  तत्पश्चात ल्योतार तथा फ्रेडकरिक जेमसन ने उत्त्तर आधुनिकता पद पर विचार व्यक्त कर इसका विकास किया। ल्योतार (Lyotard) ने‘द मोस्ट मॉडर्न कंडीशन’ (1979) नामक पुस्तक में उत्तर-आधुनिकता के दर्शन को स्पष्ट किया है । आज इए इस लेख में हम uttar adhunikatavad kya hai को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

इसे समझने के लिए इस कृपया इस लेख को पूरा पढ़ें। इसे और भी भली-भांति समझने के लिए इसके साथ जो नीचे वीडियो है उसे भी देख लीजिए तो uttar adhuniktavad की इस अवधारणा को आप निश्चित रूप से पूरी तरह से और अच्छी तरह से समझने में सफल हो पाएंगे ।

उत्तर आधुनिकता महावृतांतों (रामायण, महाभारत, बाइबिल आदि) को नकारती है, साथ ही वह मूल्य मीमांसा को भी नकारती है । इस प्रकार वह मूल्यहीनता की पक्षधर है ।  यह व्यक्ति केंद्रित समीक्षा दृष्टि है जो यह मानती है कि कुछ भी पूर्ण नहीं है। अतः उत्तर आधुनिकता सम्पूर्णता का खण्डन करती है ।

उत्तर-आधुनिकता का चिंतन आधुनिकता की प्रतिक्रिया या उसके विरोध में नहीं आया है। यह उसकी अपर्याप्तता की उपज है। उत्तर का तात्पर्य है ‘बाद’ (Post or After) से है । कालांतर में आधुनिकता ही उत्तर-आधुनिकता में रूपांतरित होती है।

यह सही है कि आधुनिकता ने कई देशों का औ‌द्योगिक विकास किया, रहन-सहन के स्तर को ऊँचा किया, जिंदगियों को आसान और सुविधाजनक बना दिया। लेकिन फिर भी मनुष्य के जीवन की त्रासदी अभी खत्म नहीं हुई।

 द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सर्वत्र मोहभंग की स्थिति थी । इस मोड़ पर आकर आधुनिकता की जययात्रा प्रशानांकित होने लगती है और उत्तर-आधुनिकता की विचारधारा कर जन्म होता है।

बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, राजनीति तथा कला, संगीत, वास्तुशास्त्र, साहित्य, और चिंतन में जो परिवर्तन आए हैं, उत्तर-आधुनिकतावाद उनको परिलक्षित करने वाला एक व्यापक लेकिन विवादास्पद पारिभाषिक शब्द है ।

‘उत्तर-आधुनिकतावाद’ शब्द कई भिन्न अर्थों में इस्तेमाल होता चला आ रहा है। यह वर्तमान समय की विचारधारा है, मूड है, ऐतिहासिक युग है, सांस्कृतिक कलावस्तु है, सामाजिक अनुलक्षण है । यह सैद्धान्तिक संवाद, पारिभाषिक परिचर्चा या वर्तमान वृतांत है । यह एक ऐसा समय है जिसमें सब कुछ ‘उत्तर’ हो चुका है या उसके अंत का ऐलान कर दिया गया है।

उत्तर-आधुनिकतावाद की प्रमुख विशेषताएँ  

उत्तर आधुनिकता की प्रमुख विशेषताएं निम्नानुसार हैं :

  • विभेद और विभिन्नता,
  •  स्थानीयता और क्षेत्रीयता,
  •  पापुलर कल्चर और लोक कलाओं का मिलाप,
  •  बुद्धिवाद और परा-भौतिकवाद पर बढ़ता अविश्वास,
  • नारी तथा दमित-दलित विषयों का अध्ययन,
  • महान आख्यान तथा सार्वभौमिक आलोचना सिद्धांत का पतन,
  • अर्थ की अनेकता तथा अनिश्चितता,
  • बहुलतावाद तथा बहु-संस्कृतिवाद,
  • विकेंद्रीयता वर्ग-संघर्ष की अपेक्षा नस्ल, जाति तथा लिंग-भेद पर अधिक बल।
  • अर्थात् ऐसी विचार-पद्धति जिसमें वैश्विक क्षेत्रीय तथा जातीय संरचनाएँ एक-दूसरे से युद्धरत रहते हुए भी परस्पर मेल-जोल भी रखती हैं।

पृष्ठभूमि और देशकाल

उत्तर-आधुनिकतावाद साठ के दशक के उन मुक्ति आंदोलनों से निकला है जिन्होंने व्यक्ति तथा व्यवस्था, अल्प-समूह तथा वृहद् समाज, विचारों तथा विसंगतियों, मूल्यों तया विधि-विधान, विचारधाराओं, नीतियों, राजनीति, राष्ट्रीयता आदि पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए।

 नारी मुक्ति, अश्वेत रोष, शांति मार्च, युवा विद्रोह, यौन क्रांति और न जाने कितने छोटे-मोटे आंदोलनों ने विभेदों और केंद्रियता के चकव्यूह को तोड़कर समाज तथा संस्कृति को विभिन्न विभाजित स्वायत्त रचनाओं और इकाइयों में बदल दिया।  

इस प्रकार मुक्ति आंदोलनों, पार्टेबल विडियो, रिकॉर्ड प्लेयर, कंप्यूटर टेक्नोलॉजी, सूचना विस्फोट तथा विखंडनों आदि ने मिलकर जो नया परिदृश्य निर्मित किया उसे उत्तर आधुनिकतावाद की संज्ञा दी गई।

उत्तर-आधुनिकतावाद की प्रवृत्ति 1880 से ही चित्रकला में प्रदर्शित होती चली आ रही है। 1940 से वास्तुकला में इसका प्रभाव बढ़ना शुरू हो गया।

ऑर्नल्ड टॉयनबी के अनुसार 1925 के लगभग यूरोपीय संस्कृति में उत्तर-आधुनिकतावाद का दौर शुरू हो चुका था। इसी समय अमरीकी चिंतकों के व्याख्याओं के हवाले से भारत में भी इसकी अनुगूंज सुनाई देने लगी ।

हिंदी साहित्य में अस्सी के दशक से इसकी चर्चा होनी शुरू हो गई और यह चर्चा सदी के अंतिम दशक में साहित्यिक विमर्श को केन्द्र बन गई।

उत्तर आधुनिकतावाद का विस्तार

नब्बे के दशक तक पहुँचते-पहुँचते उत्तर-आधुनिकता का प्रभाव-क्षेत्र इतना विस्तृत हो गया कि यह कला, साहित्य, संस्कृति, राजनीति तथा समाजशास्त्र के विमर्श के केंद्र में आ गया।

उत्तर-आधुनिकता के प्रभाव क्षेत्र का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि फिल्म से लेकर फैशन तक. विचार से लेकर विज्ञापन तक, कल्चर से लेकर कॉमिक्स तक, इतिहास, दर्शन, कला, साहित्य, मीडिया सब उत्तर-आधुनिकतावाद से प्रभावित हुए हैं।

उत्तर-आधुनिकतावाद की अवधारणा

उत्तर-आधुनिकतावाद की अवधारणा की प्रमुख विशेषता विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :

  • क. उत्तर-आधुनिकतावाद बहुलतावाद अथवा बहु-संस्कृतिवाद पर आधारित है।  
  • ख. उत्तर-आधुनिकतावाद केंद्रीयता की अपेक्षा क्षेत्रीयता/स्थानीयता पर बल देता है
  • ग. उत्तर-आधुनिकतावाद एकीकृत के बजाय विभिन्नता या अन्यता को मूल प्रश्न मानता है ।

इसके परिणामस्वरूप विरोधी विचार, हाशिए पर स्थित लोग, परिधि पर स्थित जातियाँ, मूलवंशी समूह, नारी वर्ग, समलैंगिक स्त्री-पुरुष, हर प्रकार के विपथगामी लोग जिनकी पहचान या आवाज़ नहीं थी और जिन्हें सत्ता की भागीदारी, समाज में सक्रियता तथा सांस्कृतिक संवाद के दायरे से बाहर रखा या समझा गया था, अब वर्चस्व के संघर्ष के नए समूह बनकर उभरने लगे।

इन मु‌द्दों को लेकर भारत की राजनीति, संस्कृतियों तथा साहित्यों में जो हो रहा है वह अवधारणा के अनुकूल ही प्रतीत होता है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि उत्तर-आधुनिकतावाद ने इतिहास को क्रमिक के बजाय अवरुद्ध, रैखिक के बजाय वर्तुल, संयुक्त के बजाय विभाजित, एक के बजाय अनेक, केंद्रित के बजाय विकेंद्रित घोषित कर दिया।

उत्तर-आधुनिकतावाद के मूल तत्व

यहाँ उत्तर-आधुनिकतावाद के उन मूल तत्वों का उल्लेख किया गया है जिन पर उत्तर-आधुनिकतावाद की विचार-प्रणाली आधारित है ।

विकेंद्रीयता

उत्तर-आधुनिकतावाद केंद्र से परिधि की ओर यात्रा करता है । समाज के विभिन्न समूह जो हाशिये पर हैं या जिन्हें हाशिये पर ढकेल दिया गया है वे अब महत्वपूर्ण हो गए हैं ।

स्थानीयता

विकेंद्रीयता का प्रश्न स्थानीयता से संपृक्त है।  उत्तर-आधुनिकतावाद वैचारिकता के बजाय क्षेत्रीयता तथा स्थानीयता पर अधिक बल देता है ।

प्रभुत्व के लिए संघर्ष

इसी महत्व के कारण विभिन्न समूहों में प्रभुत्व के लिए संघर्ष शुरू शुरू हो गया है।

विकेंद्रित केंद्र

प्रभुत्व के इस संघर्ष का परिणाम यह हुआ है कि पुराने एकीकृत केन्द्रों के बजाय नए-नए समीकरण वजूद में आ रहे हैं। समीकरण भी निरंतर बदलते रहते हैं ।

विभिन्नता

 उत्तर-आधुनिकतावाद इस बात पर बल देता है कि लोगों का एक समूह प्रायः दूसरे समहों से अपनी मूल संरचनाओं (संस्कृति/संवेदना, रीति-रिवाज, परंपरा, भाषा, विश्वास आदि) के कारण भिन्न तथा अलग होता है ।

हम और वे

इससे हम और अन्य में भेद किया जा सकता है । हम और अन्य का संघर्ष अनिवार्य है ।

अस्मिता/स्वत्व/पहचान

यह संघर्ष स्वत्व तथा पहचान की समस्याओं को जन्म देता है। भिन्नता, अस्मिता, तथा अन्यता इस तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि वे लोग जिनके हित तथा विचार एक-दूसरे से टकराते हैं वे यह महसूस करते हैं कि कोई ऐसा सर्वमान्य व्यापक मुद्दा नहीं जिसके लिए सब एकमत हों। इसी से स्वायत्तता का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है ।

युगल विपरीता

उत्तर-आधुनिकतावाद का यह मूल तत्व समझा जाना चाहिए । युगल विपरीतता का तात्पर्य यह है कि दो विपरीत समूह एक-दूसरे से इस प्रकार जुड़े होते हैं कि इन्हें बिलकुल अलग कर देना संभव नहीं ।

लेकिन इस जुड़ाव में एक-समूह का दूसरे पर वर्चस्व स्थापित होता है । जैसा कि स्त्री-पुरुष । इसमें स्त्री पर पुरुष का वर्चस्व है । अतः इस असमानता को समाप्त करना आवश्यक है ।

कर्ता का अंत

उत्तर-आधुनिकतावाद कर्ता (सब्जेक्ट) के केंद्रीय स्थान या महत्व को स्वीकार नहीं करता । अर्थात् अब मानव संवेदना का कोई अर्थ नहीं रह गया। मिशेल फूको के शब्दों में ‘सागर किनारे रेत पर बनाए गए चेहरे की भाँति मनुष्य का निशान मिट जाएगा ।’

चिन्हवाद

 उत्तर-आधुनिकतावाद यथार्थ की नई परिभाषा प्रस्तुत करता है । इसकी दृष्टि में कोई वास्तविक संसार नहीं है। यथार्थ एक सामाजिक अवधारणा है। एक प्रतिबिंब है। एक विभ्रम है जिसकी सत्यता को प्रमाणित नहीं किया जा सकता, क्योंकि संसार एक ऐसा रंगमंच है जिसमें प्रत्येक वस्तु एवं विचार ‘इमेज़्ड तथा मैनीप्यूलेटेड’ है । हम वास्तविकता को कृत्रिमता अर्थात् चिन्हों तथा प्रतिबिंबों द्वारा ही जानते हैं ।

लोकप्रिय संस्कृति

उत्तर-आधुनिकतावाद लोकप्रिय संस्कृति का समर्थन करता है। यह अभिजात्य कला को सामान्य कला से श्रेष्ठ स्वीकार नहीं करता।  दरअसल उत्तर-आधुनिकतावाद ‘हाई आर्ट’ और ‘लो आर्ट’ में कोई भेद नहीं करता ।

अंतर्विषयीय चिंतन

उत्तर-आधुनिकतावाद ज्ञान-विज्ञान और कला की सीमा रेखाओं को स्वीकार नहीं करता। दो या अधिक शास्त्र मिलकर नए-नए शास्त्रों को जन्म दे रहे हैं। जीवन का प्रत्येक क्षेत्र और समाज की हरेक धारा एक-दूसरे में घुल-मिल रही हैं। पद्य ग‌द्यात्मक हो रहा है और गद्य पद्‌‌मात्मक । कथा साहित्य को इतिहास लेखन और इतिहास को फिक्शन का एक ही फार्म कहा जा रहा है।

अंतवाद

उत्तर-आधुनिकतावाद को अंतवाद की संज्ञा भी दी गई है। क्योंकि इसमें प्रत्येक विचार, वस्तु तथा कला अभिव्यक्ति के अंत की घोषणा कर दी गई है। इसमें ईश्वर का निधन, मनुष्य (कर्ता) की मृत्यु, इतिहास का अंत,  विचारधारा का अंत, कला और साहित्य तथा लेखक का अवसान शामिल है ।

पूर्णतावाद का विरोध

उत्तर-आधुनिकतावाद किसी भी प्रकार के पूर्णता में विश्वास नहीं रखता । इसके अनुसार कुछ भी शाश्वत, संपूर्ण, अंतिम तथा स्थिर और स्थायी नहीं। सब कुछ अनिश्चित और क्षणिक है । यहाँ तक कि शब्दों के कोई स्थायी अथवा निश्चित अर्थ नहीं होते।

आधुनिकतावाद बनाम उत्तर-आधुनिकतावाद

यह प्रश्न बार-बार उठाया जाता है कि क्या आधुनिकता का युग समाप्त हो चुका है और उत्तर-आधुनिकता इसका अगला चरण है ।

कुछ लोग यह स्वीकार करते हैं कि उत्तर-आधुनिकता अन्य माध्यमों से आधुनिकता का ही विस्तार या इसकी परिपूर्ति है ।

उत्तर-आधुनिकता केंद्रीय वर्चस्व के विपरीत स्थानीयता तथा भेदों पर बल देती है जबकि आधुनिकता सार्वभौमिकता तथा एकरूपता पर आधारित है।

आधुनिकता में पुनःनिर्माण, पुनःस्थापन आदि और उत्तर-आधुनिकतावाद में वि-रचना, विकेन्द्रीकरण आदि शब्द प्रचलित हैं ।

उत्तर-आधुनिकता आधुनिकता का अंत नहीं बल्कि यह उसके भीतर हमेशा से प्रस्फुटित होने की अवस्था में मौजूद है और यह अवस्था निरंतर जारी है।

साहित्य में उत्तर-आधुनिकतावाद

उत्तर-आधुनिकतावाद का साहित्य-चिंतन तथा सिद्धांत पर गहरा प्रभाव पड़ा है | उत्तर-आधुनिकतावाद किसी सर्वव्यापी शाश्वत मूल्यांकन के प्रतिमान को स्वीकार नहीं करता।

अतः अब कोई सर्वमान्य मानदंड नहीं है । कोई एक स्वीकार्य सौंदर्यशास्त्र नहीं। कोई कृति कालजयी, श्रेष्ठ या विश्वव्यापी नहीं। कोई मूल तथा केंद्रीय या एकीकृत, अंतिम, संपूर्ण साहित्यिक मानदंड नहीं ।

उत्तर-आधुनिकतावादी कई वैचारिक पद्धतियों का साहित्यिक चिंतन पर गहरा प्रभाव पड़ा है । इनमें नव-इतिहासवाद,  सांस्कृतिक अध्ययन तथा नारीवाद शामिल हैं।

इस प्रकार उत्तर-आधुनिकतावाद ‘साहित्य समीक्षा’ के स्थान पर ‘विमर्श विश्लेषक’ को बैठा देता है । इसमें लेखक के अवसान की घोषणा की जाती है और पाठक के वर्चस्व को स्वीकार किया जाता है।

उत्तर-आधुनिकतावाद के अनुसार जिन कृतियों को बौद्धिक, सांस्कृतिक तथा सौंदर्यात्मक तौर पर विशिष्ट माना गया यदि इनका विखंडन करें तो पाठ (टैक्स्ट) के भीतर मौजूद उप-पाठों और भाषा के पीछे छिपी अभिजात्य विचारधारा और संवेदना दिखाई देने लगती है ।

उत्तर-आधुनिकतावादी कई वैचारिक पद्धतियों का साहित्यिक चिंतन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इनमें नव-इतिहासवाद, सांस्कृतिक अध्ययन, सबार्टन (अधीनस्थ) अध्ययन तथा नारीवाद शामिल है ।

ये सब वैचारिक पद्धतियाँ साहित्यिक पाठ को अ-साहित्यिक दृष्टिकोण अर्थात्  – ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, नारीवादी, दलित चेतना आदि से देखती हैं और इसी दृष्टि से उसका मूल्यांकन करती हैं।

वर्तमान परिदृश्य

अब यह कहा जा रहा है कि उत्तर-आधुनिकतावाद 1980 में अपने चरम बिंदु पर पहुँच चुका था। वह एक सौ वर्ष पुराना हो चुका है क्योंकि चित्रकला 1880 से ही उत्तर-आधुनिक प्रवृत्तियों को प्रदर्शित करती चली आ रही है।

1940 में वास्तुकला में इसका प्रभाव बहुत बढ़ गया था। आर्नल्ड टॉयनबी के अनुसार 1925 में उत्तर-आधुनिकतावाद का दौर शुरू हो चुका था ।

‘न्यू यार्कर’ ने 1975 में ही लिख दिया था कि उत्तर-आधुनिकतावाद का युग समाप्त हो चुका है ।

भारत में इसकी चर्चा अस्सी के दशक के अंतिम वर्षों में शुरू हुई।  यह भी कहा जा रहा है कि उत्तर-आधुनिकतावाद अब अकादमिक परिचर्चा तक ही सीमित होती जा रही है । अब उत्तर-उत्तर-आधुनिकतावाद का युग शुरू हो चुका है।

उत्तर-आधुनिकतावाद का मूल्यांकन

आधुनिकता की भाँति उत्तर-आधुनिकता के अर्थ भी निरंतर बदलते रहे हैं । इसमें भी अंतर्विरोधों की कमी नहीं है।

 उत्तर-आधुनिकतावाद की सबसे बड़ी स्थापना ‘कर्ता का अंत’ दोषपूर्ण है। किंतु इससे भी बड़ा प्रश्न हमारे सामने यह है कि क्या उत्तर-आधुनिकता हमें उन तथ्यों तथा  विचारों से मुक्ति दिला सकती है जो वैचारिक विभ्रांति, सांस्कृतिक संकट तथा बौद्धिक बेचैनी का कारण बने हुए हैं।

क्या विभेद की राजनीति हमें सांस्कृतिक शून्यवाद की ओर नहीं ले जा रही? ये कई अन्य प्रश्न उत्तर-आधुनिकतावाद में अनुत्तरित रह जाते हैं।

निष्कर्ष

उत्तर-आधुनिकतावाद की प्रमुख विशेषताएं हैं –

  •  विभेद ओर विभिन्नता,
  •  स्थानीयता और क्षेत्रीयता,
  •  पापुलर कल्चर और लोक कलाओं का मिलाप,
  • बुद्धिवाद और परा-भौतिकवाद पर बढ़ता अविश्वास,
  •  नारी तथा दमित-दलित विषयों का अध्ययन,
  •  महान आख्यान तथा सार्वभौमिक समालोचना सिद्धांत का पतन,
  • अर्थ की अनेकता तथा अनश्चितता,
  • बहुलताबाद तथा बह संस्कृतिवाद,
  •  विकेंद्रीयता,
  •  वर्ग-संघर्ष की अपेक्षा नस्ल, जाति तथा लिंग भेद पर अधिक बल ।
  • अर्थात उत्तर-आधुनिकतावाद ऐसी विचार पद्धति है जिसमें वैश्विक क्षेत्रीय तथा जातीय संरचनाएं एक-दूसरे से युद्धरत रहते हुए भी  एक-दूसरे से मेल-जोल भी  रखती हैं।

उत्तर-आधुनिकतावाद का  जन्म और पोषण यूरोप की विशेष ऐतिहासिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितयों में हुआ है। यदि हम इसको भारतीय साहित्यों तथा स्थितियों के संदर्भ में प्रस्तुत करना चाहते हैं तो हमें देशीय/भाषीय संदर्भों में इसे परिभाषित करना होगा।

भारतीय साहित्य अभी उत्तर-आधुनिकतावाद से आक्रांत नहीं हुआ है। कुछ लोगों ने मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कुरु कुरु स्वाहा’ और उदय प्रकाश की कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड़’ में उत्तर-आधुनिकता की अनुगूंज सुनी है, किंतु यह संकल्पना अभी हिंदी में प्रवेश कर रही है।

भूमण्डलीकरण और उपभोक्तावादी संस्कृति के दबाव से हम बच नहीं सकते । अतः देर-सबेर यह विचारधारा हिंदी साहित्य में अवश्य आएगी, किंतु हम इसे भारतीय परिवेश में ही स्वीकार करेंगे न कि पाश्चात्य विचारकों की नकल करेंगे।

error: Content is protected !!